राम सरीखे हो लेंगे
अधिकारों की चाह छोड़ जो वल्कलधारी हो लेंगे,
स्वर्ण मृगों के चक्कर वो राम सिया को खो देंगे।
झुक जाना अच्छा है लेकिन भिड़ जाने की बात अलग,
घाव समर के सह लेंगे पर घात किया तो रो देंगे।
इंसानों को ज़िद देकर हद़ में रहने को कहते हो,
लहराने लग जाये ऊसर जो श्वेद जमीं में बो देंगे।
नर बनकर नारायण ने भी जग को यही सिखाया है,
मर्यादा पर टिके रहे तो राम सरीखे हो लेंगे।
✍🏻 दशरथ रांकावत 'शक्ति'

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बहुत धन्यवाद इस प्रोत्साहन के लिए