पहचान जरूरी है
दिन भर तो सूरज ने तम को हर डाला,
शाम ढले ढल जाना भी मजबूरी है।
धूप कहां तक जीने की उम्मीदें दे,
खुद पर भी विश्वास बहुत ज़रूरी है।
डर लगता है रातों से अंधियारे से,
खुल कर बोलों कहना बहुत जरूरी है।
किसने सोचा धरती है मंगल भी होगा,
कौन दिशा है और कहां तक दूरी है।
हम वो हैं जिसने सागर को बांधा था,
और धरती पर सुरसरि उतारी है,
जाने कितनी बार झुकाया देवों को,
फिर खुद से खुद की पहचान ज़रुरी है।
✍️ दशरथ रांकावत 'शक्ति'

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बहुत धन्यवाद इस प्रोत्साहन के लिए