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हुंकार





 लहू की आरजू है मिट्टी को गुलाल करें,

छिने जो हक गरीब का तो उठ सवाल करें। 


खुदी के वास्ते जिये तो कौन याद रखें, 

 मरो तो यूं मरो कि मुल्क ये मलाल करें।


उसी का हक गया जो मौन रह के सहता गया,

है बोलबाला उसी का जो उठ बवाल करे।


है मुल्क शेरों का ये इसमें कोई शक न रहे,

क्यों हैरत हो जो बच्चे भी अब कमाल करे।


लगा के घात सारी दुनिया इंतज़ार में है, 

दुआएं मां की साथ है वही तो ढाल करे।


रगों में राणा अरु शिवाजी बह रहे हैं शक्ति,

अजब नहीं जो अकेला ही सौ हलाल करें।


✍🏻 दशरथ रांकावत 'शक्ति'

Comments

  1. बहुत खूब ✍🏻👌🏻

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बहुत धन्यवाद इस प्रोत्साहन के लिए

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