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पहले


एक नयी रचना पेश ए खिदमत है:-


-: पहले :-


 जुर्रत-ए-जुनून के उछाल से पहले

जान झोंकनी पड़ती है कमाल से पहले


हर एक खेल का एक अपना उसूल है

खिलाड़ी को समझना है चाल से पहले


मर नहीं जाएंगे तेरे बगैर कहने वालों

लम्हा गुज़ारना पड़ता है साल से पहले


मैदान-ए-जंग में सिर्फ तलवारें काफ़ी नहीं

ख़ास हौसला भी चाहिए ढाल से पहले


ज़िंदगी में मुश्किलों की इंतहा तो देखो

लहरों से उलझना है ज़ाल से पहले


इंसान में इंसानियत ढूंढने वालों देखो

आत्मा तक बिक रही है खाल से पहले


झूठी रवादारी का ढोंग तो ना करो 'शक्ति'

भाई पानी तो पूछ लेते दाल से पहले


✍🏻 दशरथ रांकावत 'शक्ति'


रवादारी - शिष्टाचार



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