तरकश के तीर
बाजूओं के ज़ोर को ला मुठ्ठियों में भींच कर,
अंगार का आह्वान अपनी त्योरियों के बीच कर।
शत्रु को मौक़ा न दो कि एक पग पीछे हटे,
सामने चंडी दिखे, हो वार ऐसा खींच कर।
✍🏻 दशरथ रांकावत 'शक्ति'
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नहीं सदा रहती तरुणाई नहीं सदा ये बल,
जीवन ये काजल की कोठी फूंक फूंक कर चल।
भूलें से भी हो ना पाये कभी किसी की हानि,
कर्मों का फल निश्चित मिलना है आज नहीं तो कल।
✍️ दशरथ रांकावत 'शक्ति'
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सुनो धृष्टद्युम्न! चाल समय की बड़ी अजब मतवाली है,
नैतिकता मत ढूँढ़ो तुम, यह कोश हुआ अब खाली है।
लालच ने सब कुछ रौंद दिया—नेह, मित्रता, रिश्ते भी,
आज द्रौपदी स्वयं द्रुपद से पाँचाल माँगने वाली है।
✍️ दशरथ रांकावत 'शक्ति'
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ये प्रमाणित सत्य है रिश्वत खाने वाला
मांसाहारी होता है क्योंकि वो जो खा रहा है
वो किसी का हक़,खून-पसीना और चर्बी है।
- दशरथ रांकावत 'शक्ति'
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दिन भर तो सूरज ने तम को हर डाला,
शाम ढले ढल जाना भी मजबूरी है।
धूप कहां तक जीने की उम्मीदें दे,
खुद पर भी विश्वास बहुत ज़रूरी है।
अपने हक़ पर जहां कहीं घुसपैठ दिखें,
खुल कर बोलों कहना बहुत ज़रूरी है।
सब के जैसे मौन रहोगे तो प्यारे,
सच तो ये है मौन वहां मंजूरी है।
✍🏻 दशरथ रांकावत 'शक्ति'
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अंदाज़ ही देखा है तुमने, केसरिया तेवर नहीं देखा,
बिना सर का शूरमा, बिना धड़ का कलेवर नहीं देखा।
जहाँ की मिट्टी मेरे ख़ून में अंगार बनकर दौड़ रही,
वहाँ तलवार सबने देखी है, भले ही ज़ेवर नहीं देखा।
✍️ दशरथ रांकावत ‘शक्ति’
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कोई हो दूसरा नाराज़ पकड़ कर हाथ भी लाये,
गया हो छोड़ कर कोई मना कर साथ भी लाये।
मनाये कौन उनको जो खुदी से है ख़फ़ा 'शक्ति'
वगरना मिन्नतों के बाद खुद भगवान भी आये।
दशरथ रांकावत 'शक्ति'
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बहुत धन्यवाद इस प्रोत्साहन के लिए