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वीर अभिमन्यु

जब जीवन मूल्यों का हनन होता है तो क्या होता है ये महाभारत सिखाती हैं महाभारत में  वीरता और मानवीय साहस और शौर्य की जाने कितनी कहानियां भरी पड़ी है।

कर्ण, अश्वत्थामा, एकलव्य, अर्जुन,की कथाएं तो प्रचलित है उसी क्रम के  एक ऐसे ही वीर की ऐतिहासिक कहानी सुनिए मेरी ज़ुबानी.....


चक्रव्यूह के सात द्वार हैं, सबके खंडन का ज्ञान मुझे,

आयु अल्प है, ज्ञान अधूरा, फिर भी साहस कर सकता हूँ।


मैं अभिमन्यु, अंतिम पांडव हूँ, अवसर है उत्सर्जन का,

अमर नहीं हो जाता जब तक, मैं कैसे मर सकता हूँ।


दिग-दिगंत अपनी ख्याति है, चमत्कार अपना कौशल है,

विजय वरण करने के खातिर रुद्र रूप धर सकता हूँ।


जिनके चलने से दिग्गज डोले, भाले पर अरिमुंड सजे,

मेरे पुरखे खुद कालजयी, तो मैं कुछ भी कर सकता हूँ।


कर्ण, द्रोण, कृप, अश्वत्थामा, जयद्रथ, दुर्योधन, दुःशासन,

ऐसे सूर्यों का ताप सकल अपने अंदर भर सकता हूँ।


वीर धनंजय का सुत हूँ मैं, शिष्य सुदर्शनधारी का,

प्रलय है मेरे पालक, तो क्या मैं रोके रुक सकता हूँ?


काल स्वयं रण को आ जाए, पीछे हटना स्वीकार नहीं,

खुद धर्म हमारे साथ खड़ा, तो मैं कैसे डर सकता हूँ।

 

साहस की कोई आयु नहीं, ना ही आश्रित वो साधन पर,

रण में रथ के पहिए से भी अरि-दल मर्दन कर सकता हूँ।


आगे क्या हुआ, इतिहास साक्षी, कैसे जुझार लड़ा सबसे,

साक्षात् रुद्र भिड़ गए समर में, बस इतना कह सकता हूँ।


✍️ दशरथ रांकावत 'शक्ति'




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