तिश्नगी
सोचता था जी भरेगा जिंदगी जीने के बाद
और ज्यादा ही बढ़ी है प्यास तो पीने के बाद
आदमी कि तिश्नगी की इंतहा मुमकिन नहीं
लोभी पारस मांगता है मूंगा और मीने के बाद
चंद रौनक पा के इंसा भाग्य को झुठला रहा है
रामजी को याद करता किन्तु सब छीने के बाद
इश्क़ भी है जंग यारों कुछ अलग बस ढंग है
रफ्ता रफ्ता छेदती है दिल को भी सीने के बाद
अपनी मेहनत से मिले का मोल शक्ति जानलो
स्वाद दुगुना फूटता हैं रोटी तर पसीने के बाद
✍️ दशरथ रांकावत 'शक्ति'


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बहुत धन्यवाद इस प्रोत्साहन के लिए