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असलियत

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      झूठ इसलिए भी जीत जाता है आजकल अक्सर, सच को सच बताने में झूठों का सहारा लगता है। सलाह बिन मांगे मिलेगी मदद मांगने पर भी नहीं, तभी मालूम चलता है हमारा है कि हमारा लगता है।  दो रोटी इज़्ज़त से महंगे जल्लादों से पूत यहां है, लेकिन मां है जिसको फिर भी बेटा प्यारा लगता है। जब तक मेहनत रंग ना लाये मेहनत कौन समझता है, खुद बाबा को अपना बेटा बस आवारा लगता है। दुनियां की जितनी दौड़े है सबका यही सलीका है, जीत से बेश़क चूकें लेकिन दम तो सारा लगता है। हार गये है मरे नहीं है आज नहीं तो कल जितेंगे, गुमनामी का लेबल हमको बहुत गंवारा लगता है। अनुभव भी दौलत होती है हार ने ये तो सिखलाया, तख्त मिले अनुभव बिन जिसको बहुत बेचारा लगता है। साहिल से तकने वाले को दरिया भला लगेगा 'शक्ति', लेकिन भंवर फंसे मांझी को भला किनारा लगता है। ✍🏻 दशरथ रांकावत 'शक्ति'

पहले

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एक नयी रचना पेश ए खिदमत है:- -: पहले :-  जुर्रत-ए-जुनून के उछाल से पहले जान झोंकनी पड़ती है कमाल से पहले हर एक खेल का एक अपना उसूल है खिलाड़ी को समझना है चाल से पहले मर नहीं जाएंगे तेरे बगैर कहने वालों लम्हा गुज़ारना पड़ता है साल से पहले मैदान-ए-जंग में सिर्फ तलवारें काफ़ी नहीं ख़ास हौसला भी चाहिए ढाल से पहले ज़िंदगी में मुश्किलों की इंतहा तो देखो लहरों से उलझना है ज़ाल से पहले इंसान में इंसानियत ढूंढने वालों देखो आत्मा तक बिक रही है खाल से पहले झूठी रवादारी का ढोंग तो ना करो 'शक्ति' भाई पानी तो पूछ लेते दाल से पहले ✍🏻 दशरथ रांकावत 'शक्ति' रवादारी - शिष्टाचार

वक्त

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  जलते हुए दियों को मत बुझाया कर, यूं तुफान की तरह मत आया कर। हमनें कोशिशों में जान झोंक दी है, इतनी बेरहमी से मत आजमाया कर। सब कुछ नहीं होता है किस्मत में यहां, अपनी मेहनत से  मुकद्दर बनाया कर। हमको भी कहते थे सो हम कहते हैं, ख़र्च करना है अगर तो कमाया कर। आग तेरा कहर है तो बरपा बेशक, बेगुनाहों को इसमें न जलाया कर। जिंदगी अनमोल है जान  लो  'शक्ति', इश्क़ बाज़ी में इसे न जा़या कर। दशरथ रांकावत 'शक्ति'  

शिव स्तुति

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  नमामि सदाशिव नमामि भोला शंकर, रहे शैल कैलाश बसो चाहे कंकर। तुम्हीं नाथ बोलो भगत किसको ध्यावे, कभी दीनबंधु कभी भट्ट भयंकर। तुम्हारे गले वासुकी व्याल साजे, सदा घंट डमरू दुंदुभी ही बाजे।   नवांऊ में मस्तक या नांचू तरंग में, तुम्हीं तन में मन में सदा से विराजे। स्वयंभू त्रिलोचन महाकाल भोला, चले आये दौड़े निभाने जो बोला।  कभी दीन वत्सल कभी काल भैरव, जटाजूट हर्षित है हर-हर जो बोला। तुम्हारी शरण में मुझे कैसा भय हो, जहां काल को भी महाकाल भय हो। तुम्हारी कृपा जो कोई जीव पा ले, फिर तो प्रलय में भी किंचित न क्षय हो। ✍🏻 दशरथ रांकावत 'शक्ति'

हुंकार

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 लहू की आरजू है मिट्टी को गुलाल करें, छिने जो हक गरीब का तो उठ सवाल करें।  खुदी के वास्ते जिये तो कौन याद रखें,   मरो तो यूं मरो कि मुल्क ये मलाल करें। उसी का हक गया जो मौन रह के सहता गया, है बोलबाला उसी का जो उठ बवाल करे। है मुल्क शेरों का ये इसमें कोई शक न रहे, क्यों हैरत हो जो बच्चे भी अब कमाल करे। लगा के घात सारी दुनिया इंतज़ार में है,  दुआएं मां की साथ है वही तो ढाल करे। रगों में राणा अरु शिवाजी बह रहे हैं शक्ति, अजब नहीं जो अकेला ही सौ हलाल करें। ✍🏻 दशरथ रांकावत 'शक्ति'

आरज़ू

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  नहीं नुस्खा कोई यारों गम-ए-दिल रोज उबल आये, कोई दरिया नहीं दबता दबाने से मचल  जाये  । गया था सांझ दरिया पर बदन से जां छुड़ाने को, वहीं देखा उसे रोते इरादा हम बदल आये। तुम्हारी याद का कोई मुकम्मल वक्त तो तय हो, भजन लिखने जो बैठा था भजन छूटा ग़ज़ल आये। उसे इस बात पर हमसे अदावत है हम कैसे, भरी महफिल से बिना बहके बिना फिसले निकल आये। ज़रा धीरे चलो सांसो दिवाना  इक है सजदे में, तुम्हारे आने जाने से सजदे में खलल आये। दिवानों से भरी महफिल दिवानें ही दिवानें है, ज़रा संभलो ज़रा संभलो कहीं ना दिल पिघल जाये। न जाने कौन मिट्टी से बनाते हो ग़ज़ल शक्ति, हज़ारों नुक्स है फिर भी गुलाबों की महक आये। ✍🏻 दशरथ रांकावत 'शक्ति'

पहचान जरूरी है

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  दिन भर तो सूरज ने तम को हर डाला, शाम ढले ढल जाना भी मजबूरी है। धूप कहां तक जीने की उम्मीदें दे, खुद पर भी विश्वास बहुत ज़रूरी है। डर लगता है रातों से अंधियारे से, खुल कर बोलों कहना बहुत जरूरी है। किसने सोचा धरती है मंगल भी होगा, कौन दिशा है और कहां तक दूरी है। हम वो हैं जिसने सागर को बांधा था, और धरती पर सुरसरि उतारी है, जाने कितनी बार झुकाया देवों को, फिर खुद से खुद की पहचान ज़रुरी है। ✍️ दशरथ रांकावत 'शक्ति'

राम सरीखे हो लेंगे

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अधिकारों की चाह छोड़ जो वल्कलधारी हो लेंगे, स्वर्ण  मृगों के  चक्कर वो राम सिया को खो देंगे। झुक जाना अच्छा है लेकिन भिड़ जाने की बात अलग, घाव  समर  के  सह  लेंगे  पर  घात  किया  तो रो देंगे। इंसानों को ज़िद देकर हद़ में रहने को कहते हो, लहराने लग जाये ऊसर जो श्वेद जमीं में बो देंगे। नर बनकर नारायण ने भी जग को यही सिखाया है, मर्यादा  पर  टिके  रहे  तो  राम   सरीखे   हो  लेंगे। ✍🏻 दशरथ रांकावत 'शक्ति'

नियति या साहस

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       मनुष्य के हाथ में  वैसे  तो कुछ भी नहीं मगर जब भाग्य से लड़ने की बात कही जाए तो मानव कभी पीछे नहीं रहा उसने हमेशा अपने साहस का परिचय दिया यहाँ तक कि भगवान भी मानव रूप में धरती पर आये तो मानवीय साहस के बल पर रावण जैसे महापराक्रमी को हरा कर नये मानव मूल्यों को स्थापित किया |                         एक रचना इसी पर आधारित पेश हे:-                                                                                                                                                                 ...

दुनिया का जो तौर है उसी तौर से देखा

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  दुनिया का जो तौर है उसी तौर से देखा, हर शख्स मतलबी है हर और से देखा। उसूलों पर चलना मुश्किल मगर जो अडे़ है, मुकद्दर बदल देते है हमने हर दौर से देखा। ऐसे इश्क में देना जान भी गुनाह नही लगता, वैसे तोडना फूल भी जफा़ है जो जौर से देखा। जिनको समझा था पारस सर पे सजाया था, निकला महज एक पत्थर जब गौर से देखा। कोई खास फर्क नही किनारे और मंजिल में, सारा मजा बीच में है मैंने दोनोंं छोर से देखा। सियासत अपनी जिद्द में जंग तक करवा सकती है, वजी़र रहते है सिपाही मरते है हर और से दैखा। तुम्हारे सारे शेर किसी एक रंग के नही लगते 'शक्ति', मगर हाँ सीख जरूर मिलती है जब गौर से देखा। ✍️ दशरथ रांकावत 'शक्ति'

कृष्ण-भीष्म संवाद

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महाभारत के शांति पर्व का  एक किस्सा हे  पितामह भीष्म और भगवान श्री कृष्ण के बीच हुई  आखरी  बातचीत का काव्यात्म प्रयोग            कृष्ण- भीष्म  संवाद जीना बड़ा कठिन है गिरधर बिन अपनो के जग में, वे ही कंधा देते हैं जब शक्ति न बचती पग में। कहो स्वर्ग के सुख एकाकी कैसे भोग करूंगा, इच्छा मृत्यु पाकर भी तिल-तिल रोज मरूंगा। सोचा नहीं कभी था मैंने जिनको गोद बिठाना है, उनके शरीर को एक ना एक दिन कंधा स्वयं लगाना है। तुम क्या जानों तुमने तो छोड़ा है जो भी प्रिय था, वृज राधा गोकुल छोड़े छोड़ा जो भी आत्मीय था। सुनकर माधव हुए क्षुब्ध फिर बोले यूं मुसका कर, है महावीर है पिताश्रेष्ठ सुनना सब कान लगा कर। जिस लिये जगत कहता है मुझको मायापति लीलाधर, उस कर्म धर्म की रक्षा हित मैंने छोड़ा अपना घर। खुद से कुछ दूर किया सबको छोड़ा मैंने किसी को भी नहीं, जिसको मैं देता हूं छोड़ उसका जीना तो संभव ही नहीं। है वीर सुनो माया वश हो तुमने जो भी सब बोला है, लो क्षमा किया मैंने हालांकि तुमने रवि रज संग तोला है। जीने का सिद्धांत सदा से धर्म रहा और धर्म ही ह...

खुदकुशी

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#मुंबई: पिता और पुत्र, ने सोमवार  मुंबई के भयंदर स्टेशन के पास एक ट्रेन के सामने लेटकर आत्महत्या कर ली।   😭😭😭😭😭😭😭😭 समाचार के अनुसार, "हमें पिता की जेब से एक सुसाइड नोट मिला, जिसमें लिखा था कि वे अपने कार्यों के लिए किसी को दोषी नहीं ठहरा रहे हैं और वे स्वेच्छा से यह कदम उठा रहे हैं।"    क्या बिना किसी कारण के भी आत्महत्या की जा रही है क्या जीना इतना मुश्किल है खैर मृतकों की मनोदशा की एक रचना आप सब के लिए:-   खुदकुशी से मेरा कभी कोई वास्ता नहीं था, मगर मैं करता भी क्या कोई रास्ता नहीं था। जालसाजी की दुनिया में कहां तक टिकता, मेरी कमी थी मैं किसी को फांसता नहीं था। वो कि जिनकी गुर्बत में जाॅं निसार रहा था मैं, वक्त-ए-नादारी* में एक भी झांकता नहीं था। एक जोड़ा रहता था इस बरगद पर बड़े मौज से, बहेलिया गुज़रा और फिर वहां फाख्ता नहीं था। कहानियों में ही होता है सुखद अंत जीवन का, हक़ीक़त से उसका कभी कोई वास्ता नहीं था। ✍️ दशरथ रांकावत 'शक्ति' वक्त-ए-नादारी - तकलीफ़ में 

हम गम देखते है

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एक कवि क्या देखता है वह क्या सोचता है और फिर क्या लिखता है वह इसे दिखाता है एक कविता निवेदित  है- खुशियाँ सबको दिखती है हम गम देखते है, तुमको फिर भी लगता है हम कम देखते है। ऊँचे कंगूरे गुम्बद शिखर सबको दिखते है, हमारी नजर अलग है हम खम* देखते है। हमने जब दोस्ती की दिल देखा नीयत देखी, वो कोई और आदम होंगे जो दम* देखते है। हमको उन घुंघरूओं की गुलामी खलती है, देखने वाले यकीनन उनकी छम* देखते है। जी चाहता है चूम लूं लिपट जाऊं जाकर, आँसू थमते ही नही मेरे जब अम* देखते है। ये जो लिखते है ना बडी़ अजीब कौम है 'शक्ति' दुनियाँ सुनती है जिसे कवि वो घम* देखते है। ✍️ दशरथ रांकावत 'शक्ति' खम - स्तंम्भ जो भार उठाये रहता है दम - शक्ति , सामर्थ्य छम - झंकार,आवाज अम - चाचा, बाप का भाई, पितृभ्राता घम - कोमल तल पर कडा़ आघात लगने से उत्पन्न नाद/आवाज  

जिसने दुनियां से भिड़ने की ठानी नही

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जिसने दुनियां से भिड़ने की ठानी नही। उसकी सच में होती कोई कहानी नही।  कब्रों में है कैद सिकंदर हिटलर सब,  जिसने दुनिया जीती लेकिन जानी नही।  लेकिन ये भी सच है दुनिया उनकी है,  लीक छोड़ कर चले भीड़ की मानी नही।   जिद़ जिनकी खूबी जीत बस उनकी है,   मर जाना मंजूर मात तो खानी नही।  राही खा ठोकर बेखोफ बढो आगे,  मौत तो वैसे भी दोबारा आनी नही। अपने गम अपनी खुशियाँ बस अपने है, ये दुनियां तो रोनी या मुस्कानी नही। दरिया क्या है पी जाऊं गर प्यास लगे, मुश्किल कब तक जब तक हमने ठानी नही। कहानी होती कुछ ऐसी जो मन को भाती है, शहंशाह होते है जिसमें होती कोई रानी नही।                                ✍️ दशरथ रांकावत 'शक्ति'

बैठे बैठे तो

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  बैठे बैठे तो ये आज भी कल हो जायेगा, बेकारी मस्अला है मगर हल हो जायेगा। अकेले ही सही मगर तुम निकलो तो सही, देखना देखते ही देखते ये दल हो जायेगा। नामुमकिन कुछ भी नही अगर जिद्द है, एक न एक दिन गगन भी थल हो जायेगा। मुठ्ठियाँ कस के बाँध और इंतजार कर, जुनू से पत्थर पिघल कर जल हो जायेगा। दशरथ रांंकावत 'शक्ति'

आसानी से

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  खून के दाग़ तो धुले बडी़ आसानी से, शिकन के सल नही जाते मगर पेशानी से। गुनाहों की एक आदत है होते हैं बडे़ चुपचाप, मगर अंजाम सजा़ ही है पढो़ जिस भी कहानी से। अजब रफ़्तार में दुनिया कहाँ से हम कहाँ पहुँचे, लगाते जान की बाजी़ नही डरते हैं हानि से। पास बैठों के भी अब तो सुना है दिल नहीं मिलते, समंदर पार भी मिलती थी यहाँ सीता निशानी से। एक ये दौर है 'शक्ति' लिखा तक मुकर जाते हम, एक वो दौर था दुनियां जहाँ चलती थी ज़बानी से। ✍🏻 दशरथ रांकावत 'शक्ति'    

पहली बार

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  एक अधूरी किताब की कुछ पुरी रचनाएँ आप सभी की खिद़मत में... पहली बार ---1. चुनाव लड़ने   द़रकार  लगी है पहली बार लहरे भी द़मदार लगी है पहली बार कागज की कश्ती ना अब तक पार हुई नौका  कोई  पर  लगी   है  पहली  बार  झूठों  ने  सच्ची  सच्ची  तस्लीमें  दी गर्दन पर तलवार लगी है पहली बार ना  हिंसा ना हुडदंंग और चुनाव हुए चाकू पर ना धार लगी है पहली बार परिवर्तन  की गुंजाइश तो ना थी पर जनता ये हकदार लगी है पहली बार आस  बंधी   है  नया सवेरा  निकलेगा भली कोई सरकार लगी है पहली बार ✍️ दशरथ रांकावत 'शक्ति' पहली बार---2.बीमार जिनसे थी उम्मीद उन्ही से खतरा है बाजू  कैसे  भार  लगी है पहली बार जे़बों  मेंं  सिगरेट  हाथ  में बोतल है नस्लें सब बीमार लगी है पहली बार   खुद  पर  जिनका जोर नही उनके हाथ क्या होगा जब कार लगी है पहली बार मद़होशी  आँखो  में  पसीना चेहरे पर मेहनत सब बेकार लगी है पहली बार सींचा जिनको अपना खून पसीना देकर...

प्रेम और साहस

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 आज की इस भागती जिंदगी में प्यार मोहब्बत के लिए किसी के पास समय नही है। आज कल प्यार कपडे़ बदलने जैसा काम बन गया है जहां रोज किसी का दिल टूटता है और फिर और के साथ जुड़ जाता है। मगर ऐसा भी नही है की सच्चे प्यार करने वाले अब है ही नही है मगर अब वो समझ गये है कि दुनिया में उनकी कोई अहमियत नही है। मैनें उन सच्चे प्रेमियों की भावनाओं को अपने कवि मन से अक्षरों में बदलने का प्रयास किया है। साथ ही उन लोगों को हिम्मत देने का प्रयास किया है :-  तो लिजिए एक रचना साहसी प्रेमी के लिए:- बहुत बार सिंहासनों से उतारा गया हूँ मैं,  जलते  हुए जंगलों से गुजारा गया हूँ मैं। रास्तों  का  खौफ  तो  अब   रहा  ही  नही, बुलंदियों  के  दर  से भी पुकारा  गया हूँ मैं। जूझने की  जिद  ने  कभी  रुकने  नही दिया। सो  हार के हर एक मोड़ पर दोबारा गया हूँ मैं। तुमको  मेरी  जिद़  की   मैं  क्या  बताऊं  हद़, सहरा में अकेले  तैर  कर  किनारे  गया  हूँ मैं। ...

बोला समंदर बादल से

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कभी कभी कवि वो देखता है जो सामान्य व्यक्ति की आँखो से  नहीं देखा जा सकता है।  आज कुछ ऐसी ही एक रचना आप सभी के लिए लाया हूँ :- बादल और समंदर की बातचीत    रोना है जी भरकर मुझको आँसू दे दो,  एक समंदर बादल से यूं बोल रहा था। जिसने  कभी  नही  सीमायें   मानी  थी,  उसका मन भी पसीज कर ढोल रहा था।    उसका   दर्द   तड़प   देखी    मैं    पूछ   पड़ा,  किस गम में तु ! उर कपाट को खोल रहा था। हीरे  मोती  रत्न जवाहरात सब तुझमें ही,  इन सबके बदले तू ! आँसू तोल रहा था।  ------------------------------------------------ आँसू पौछ के भारी मन से सागर बोला,  दुनियां के दुख देख के मैं भी ऊब गया।  इतना  मुश्किल  है  दुनिया  में  जीना क्या,  जो भी हिम्मत हारा आकर मुझमें डूब गया।  एक  विधवा दो बच्चों को लेकर,  एक  पति   सब  अपना खो कर। एक पगली प्रेम कपट से घायल, एक  रांझा  रात...

मुफलिसी का मज़ाक

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एक रचना सामाजिक विसंगतियों और सियासी उपेक्षाओं से आहत नागरिकों के उच्च स्वाभिमान और हार न मानने की ज़िद को प्रदर्शित करती हुई। मेरी मुफलिसी का इतना मजाक ना उड़ाया कर, नहीं देना है तो ना दे मगर ख्वाब तो न दिखाया कर। जिंदा जलाना तुम्हारी फित़रत है हम मानते हैं मगर, दरिंदगी की हद होती है ख़ाक तो न उड़ाया कर। आंखों से अंधे कानों से बहरे जिस्म से अपाहिज़ रहो, सियासत में जरूरी ये है कि मुंह से चिल्लाया कर । वक्त का क्या मालूम कब कौन धोखा दे जाये यहां, दुश्मनों के साथ साथ दोस्तों को भी आजमाया कर। तुमने सभी का पेट काटा मगर तुम सर नहीं झुका पाये, ज़मीर ज़्यादा ख़तरनाक होता है सो गला दबाया कर। तमाम उम्र बस यही एक नसीहत बराबर मिली हमको, गमों पर रोना अकेले में मगर चेहरे से मुस्कुराया कर। तुम्हारे क्रोध लालच ने तुमको गली का कुत्ता बना छोड़ा, ज़रा सा गुरुर हमसे लें भौंका मत कर गुर्राया कर। ये ज़िंदगी बड़ी मेहनत से मिलती है किस्मत वालों को, ज़रा सी हार से डर कर इसको बेकार मत ज़ाया कर। तुझको तेरे राम ने यही एक हुक्म किया 'शक्ति'  कलम के दम से गुनाहगारों क...